अंत:मन का व्याकरण!

वेदना मानसिक होती है, कष्ट शारीरिक होता है, परंतु जब भी किसी विशेष से माधुर्य भंग हुआ, मैंने अनुभव की शारीरिक वेदना, मानसिक कष्ट! विचार मानसिक होते है, और वाणी बाह्य पर हर्ष के उन्मादी पलों में मैंने पाया मानस को विचार-शून्य, वाणी को मौन! प्रेम मानसिक होता है, प्रदर्शन भौतिक, किंतु भौतिकता से प्रेम … Continue reading अंत:मन का व्याकरण!

पोस्टमॉर्टम

उसके मानस पटल पर संघर्षों की चोट थी, उसकी हिम्मत बुरी तरह से ज़ख्मी थी, उसका साहस टूट चुका था, आशाओं का उबलता रक्त जम चुका था, सो आँखों में आता न था, वो थम चुका था, रूक चुका था! किंतु इनमे से कोई या ये सब मिलाकर भी, उसकी मृत्यु का कारण नहीं थे! … Continue reading पोस्टमॉर्टम

हिदायतें…शिकायतें..ख़्वाहिशें!

दस्तूर ही सही कि ख़्यालों की नुमाइश होनी चाहिए ज़ेहन में लफ़्ज़ों की मगर आज़माइश होनी चाहिए! कह न सको जो ख़ुद तो कहलवा ही दो किसी से, रिश्तों में यार इतनी तो सदा गुंजाइश होनी चाहिए! तेरे बाद ये भी अब उलझन है कि दुआओं में, माँगा भी जाता नहीं जिसकी फरमाइश होनी चाहिए! … Continue reading हिदायतें…शिकायतें..ख़्वाहिशें!

दोस्ती मुबारक!

कहते है ये कि हमने कुछ नहीं किया दोस्त सुनना चाहते ही नहीं “शुक्रिया”! किस्से तमाम ऐसे सारे याद है मुझे, जब मैंने किया न कुछ,न तूने कुछ किया! यार तू अभी अपनी कॉपी न जमा करना, मैंने अभी कल का होमवर्क नहीं किया! सुन तू फलां से कोई भी बात न करना, माँगा था … Continue reading दोस्ती मुबारक!

अनुरागी बैरागी!

वैराग से यदि अनुराग रहेगा, क्या वैराग, वैराग रहेगा? है बारीक़ पर अंतर तो है निर्मम और निर्मोही में! ज्यादा नहीं तो कुछ यों जैसे, आतंकी विद्रोही में! अर्थ-भेद जो समझे ये तुम, सार समझ तब आएगा! है मगर ये ज्ञान क्षणिक ही, आर्त अर्थ भरमाएगा! (आर्त-पीड़ा, अर्थ- भौतिक द्रव्य) संभलें हम कि डगर कठिन … Continue reading अनुरागी बैरागी!