“बनारस के महादेव”

बनारस-शहर का नाम सुनते ही कानों में रस घुल जाता है। किसी बनारसिए से शहर के बारे में पूछेंगे तो वो बताएगा,” ई बाबा विश्वनाथ के नगरी हवे जेवना की बारे में पुराणन में कहल बा कि ई साक्षात् भगवान शंकर की त्रिशूल पर स्थित बा आ पूरा विश्व में प्रलय भइला पर भी ई नगरी अपनी अस्थान पर अडिग रहेले।”
इन्हीं विश्वनाथ बाबा की नगरी में एक पादरी थे, महादेव। महादेव के पिता उनके जन्म से पहले ही चल बसे थे| जन्म होते ही माँ का भी देहांत हो गया। वो बनारस की गलियों में, हलवाइयों की दुकानों का दूध पीते हुए बड़े हुए। बनारस में जिसका कोई नाम न हो, लोग उसे महादेव बुलाते हैं सो इनका नाम भी महादेव पड़ गया।
महादेव गिरजाघर में भोजपुरी में प्रार्थना करते थे क्यूंकि उनका मानना था कि ईश्वर करूणा की पुकार हर भाषा में समझता है।

महादेव का एक नित्य-कर्म था कि वो हर दिन सांय काल अस्सी-घाट पर स्नान करने अवश्य जाते थे। स्नान से उनकी आस्था का दूर तक कोई संबंध नहीं था पर वो यह क्रिया धर्म मानकर करते थे। उनका शरीर जर्जर हो चुका था, कमर झुकने लगी थी, मुँहपोपला हो गया था। जब वो डुबकी लेकर गंगा जी से बाहर निकलते तो सफेद बाल उनके चेहरे पर यूं आ जाते कि किसी भी अपरिचित मानव को उनके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। 
स्नान के बाद वो बाबा के मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के सामने जा कर बैठ जाते। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 

शहनाई को सुन कर उन्हें लगता जैसे वो ईश्वर से भेंट कर आए हों।
बनारस की गलियां, गंगा मैय्या, बाबा का धाम, मस्जिद,गिरजा बस यही सब उनका घर थे। ईश्वर से सीधी मुलाकात की इच्छा बनारस में उम्र बढ़ते हुए अकल्पनीय रूप से बढ़ जाती है। 

अस्सी घाट पर हर चार में से तीन लोग भगवान के साथ अपने साक्षात्कार की कहानी सुनाते हुए मिल जाएंगे। महादेव के मन में भी यह इच्छा अब बहुत तीव्र हो चुकी थी।

वह अपनी प्रार्थना में अब सीघी भेंट की प्रार्थना भी करने लगे थे। उनके धर्म में ऐसी किसी भेंट की संभावना कयामत से पहले नहीं थी लेकिन

ये बनारस है बाबू-

यहाँ मेरे भोले बाबा उनके भी भोले बाबा हैं और उनके क्राईस्ट मेरे भी क्राइस्ट..!
सर्दियों के दिनों ने दस्तक दे दी थी। गंगा मैय्या की शीतलता चाँद से भी अधिक हो चली थी। महादेव को लेकिन माँ का आँचल हमेशा गर्म महसूस होता था। पर मन की गर्माहट इस बूढ़े ढाँचे को हाडतोड़ ठंड में कितना गर्म रख सकती है। तीज का दिन था, महादेव स्नान करने उतरे और गंगा मैय्या को अपनी ज़िंदगी अर्पण कर किनारे पहुँच गए।
बनारस में इंसान पैदा अनाथ हो सकता है, पर अनाथ मरता नहीं है।

मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपूर्ण किया गया।

बाबा महादेव की इस भूमि पर यमराज को आने की आज्ञा नहीं है, बाबा स्वयं दिवंगतों को मोक्ष दिलवाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

बूढ़े पादरी महादेव इससे पहले इस लोक से सिधार पाते उनके आत्माराम को स्वयंभू महादेव ने दर्शन दिए।

“कैसे हो महादेव…मोक्ष की कामना है ?”

“प्रभु, बस आपको साक्षात देखने की इच्छा थी। अब कोई इच्छा शेष नहीं।”

“मैं जीसस से बात कर के, तुम्हारी सीट रिजर्व करा सकता हूँ,ईफ ऑनली यू वांट”

“बाबा,मज़ाक करने को मैं ही मिला?

आप दोनो एक ही तो हो!!”
अात्मांश को उसके प्रांरभिक रूप में देखकर स्वयंभू मुस्कान भर लाए।

इसी अलौकिक परम सुखदायी मुस्कान के साथ महादेव प्रभु बोले-

“बस इसीलिए मैं बनारस आता हूँ महादेव क्यों की ये मेरी नहीं तुम्हारे जैसे

महादेवों की नगरी है”

इसके बाद

महादेव महादेव में समा गये। विश्वनाथ बाबा के मंदिर के बाहर पुन: शहनाई बजने लगी।

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