मियां काफिर

चौधरी साहब गाँव के सबसे अमीर इन्सान थें..सो उनकी धाक गाँव में रहती ही थी..धीरे-धीर मिल्कियत इतनी बढ़ गई कि आस-पास के सौ गाँवो तक वो कर्जा दिया करतें..! इतनी रईसी के बावजूद चौधरी साहब के बेटे नें..जिनका बचपन का नाम शोएब था..स्कुल टीचर की नौकरी करना मंजूर किया..!शोएब को गाँव का हर बच्चा बहुत इज्जत से देखता था..सभी उनके पाँव छूते थें..

शोएब की ये इज्जत चौधरी साहब की दौलत की वजह से नहीं थी..बल्कि शोएब सर की सज्जनता की वजह से थी..उन्होने गाँव के सभी लोगों को जागरुक करनें में कोई कसर ना छोड़ी थी..सभी उनकी सलाह लेना उचित समझते थें..!

शोएब सर के पाठ की वजह से गाँव में कोई हिंदू या मुसलमान नहीं बचा था..सभी इंसान हो गए थे..

शोएब सर को रामचरितमानस की कई चौपाईया कंठस्थ थी..वे बच्चों को बताते कैसे उनकी दादी सिर्फ गंगा जी का जल ही पीती थी…कृष्ण जन्मोत्सव में वे कृष्ण झाँकी में कृष्ण बनते थें..गाँव की सभी यशोदा मैय्या उनकी बलैय्या लेती थी..!
शोएब को चौधरी जी की तबीयत खराब होने के कारण शहर का भी काम देखना पड़ता। इस बार शोएब को शहर गए छ-महीने हो गए…

शहर से गाँव लौटा…तो रास्तें में कुछ बच्चे मिलें

“सर आप गाँव मत जाओ”

“लेकिन क्यूँ..क्या हो गया…??” शोएब ने पूछा…

“सर..गाँव में कल हिंदू-मुसलमान झगड़े हो गए”

शोएब मानो होश खोने लगा…ये बात उसके दिल के भीतर चोट कर गई…

बच्चे ने बात पूरी करते हुए कहा..

“हमने उनके बीस लोग निपटा दिए…पर अपने भी दो मर गए”

उसकी बात सुनकर शोएब का सर मानों जमीन में धँस गया..ऐसी भाषा अपने गाँव में पहले कभी नहीं सुनी थी उन्होनें..

“इरफान,तुम इतने चुप क्यों हों”

“सर वो जो अपने दो लोग मरें..उसमें एक इसका बड़ा भाई था”

शोएब सर की आँखो से आँसू फूटकर निकल पड़े…

“या खुदा…ये क्या कहर बरपाया तूने मेरी जमीन पर..”
दो-चार दिन में मसला शांत हुआ…शोएब सर सदमें में आकर चुप ही हो गए…उन्होने चौपाल में आकर गाँव के लोगो की तरफ देखा…सब गर्दन झुकाए खड़े थें..उन्होने किसी से कुछ ना कहा…

इरफान भी चुप था..शोएब सर ने उसकी आँखो की मांद से सभी गाँव वालो से सवाल किया..किसी के पास कोई जवाब पर कहाँ था..

महीने भर बाद भी जो सदमा शोएब के मन में घर कर गया था..कम ना हुआ..

सभी गाँव वालें एक-एक कर आकर अपनी गलती मानते रहें…पर शोएब कुछ ना बोलें..

२०-१ और इरफान के भाई के ना रहनें के लिए वो मन ही मन खुद को जिम्मेदार मानतें..
आज जन्माष्टमीं थी…शोएब सर ने सुबह उठकर गाँव में सभी को मिठाईयां बाँटी..पर किसी से कुछ ना बोलें..

शाम को जन्मोत्सव में भी शामिल हुए..

नमाज़ भी पढ़ी…पर मन का बोझ हल्का नहीं हुआ..

गंगा तट पर बैठें उन्होने देर तक विचार किया..और काफिराना हरकत को अंजाम दे ही दिया..

गंगा जी ने उन्हें दिल से लगाने में कोई संकोच नहीं किया..!

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