गाँव या शहर..!!

From the viewpoint of my father..!! शहर की चलती सड़क से एक रास्ता कटता हैं…एक छोटा सा रास्ता जो गाँव की तरफ जाता हैं…कुछ चलते ही संकरी सड़क बताती हैं कि गाँव पास ही हैं!

यूं अब गाँव की तरफ मुड़ना संयोगवश ही हो पाता हैं…इस बार ये मौका लगा बेटी की जिद से….पापा,पापा…मैने कभी गाँव नहीं देखा!

बस इतनी सी बात…और कार को शहर से गाँव की तरफ मोड़ दिया गया। कार मोड़ते समय यह अंदाजा मन में कहीं नही था कि यह रास्ता पुरानी यादों की ओर जाता हैं!!

समय भी कितना शृणभंगुर होता हैं…सुबह का “है” शाम तक “था” में बदल जाता हैं..! मेरे लिए गाँव की सुबह का भी शाम ने यही हाल किया…अब गाँव सुबह नहीं शाम बन चुका था।

गाँव पहुँचते ही अनगिनत यादें दिमाग में एक साथ कौंध गयी…ये स्कुल अभी भी है यहां…”बेटा मैं यही पढ़ता था…एक बार फर्स्ट आने पर भी रोने लगा कि सब पास हो गए और मुझे फर्स्ट कर दिया..!!😂😂 समझ नहीं थी ना तब..। और यहां वो चाय की दुकान होती थी…पिताजी दोस्तो के साथ यहीं आते थें….और वो जो खेत है ना…वो हमारे ही हैं..!!

कितनी ही यादे..कितने ही बचपन के किस्से…कितने ही चेहरे आँखो के सामने करतब दिखाने लगें..!!

यादें जब एक साथ दिमाग मे एकत्रित होती है…आँखे भावो को संभाल नहीं पाती…आंसू छलक ही आते हैं..!!

गाँव तो पहुँचे पर अपने ही घर का रास्ता भूल गए…गलियां भी चिल्ला उठी..” वाह…भूलने की भी हद होती हैं..!!”

किसी से पूछते हुए घर तक पहुँचे…द्रश्य ने मानों दिल पर गहरा आघात किया हों…मन नहीं माना तो पड़ोसियों से पूछा…क्या वाकई यह वहीं जगह हैं?? 

कुछ नहीं था वहाँ…बिखरी यादों के सिवा….बिटिया खुश थी उसने गाँव देख लिया था। नम आँखो से उसकी तरफ देखते हुए कहा..”गाँव या शहर”?

उसने मासूमियत से कहा…वापस घर..!!

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