अनुरागी बैरागी!

वैराग से यदि अनुराग रहेगा,

क्या वैराग, वैराग रहेगा?

है बारीक़ पर अंतर तो है

निर्मम और निर्मोही में!

ज्यादा नहीं तो कुछ यों जैसे,

आतंकी विद्रोही में!

अर्थ-भेद जो समझे ये तुम,

सार समझ तब आएगा!

है मगर ये ज्ञान क्षणिक ही,

आर्त अर्थ भरमाएगा!

(आर्त-पीड़ा, अर्थ- भौतिक द्रव्य)

संभलें हम कि डगर कठिन है,

रस्ता सौ सौ बार मुड़ेगा,

विरक्ति का जो दंभ हुआ तो,

अहंकार भी साथ जुड़ेगा,

जुड़ने का ही तो भय खाते हैं,

कहाँ किसे आराम मिलेगा?!

तोड़े जिसने सब जग नाते,

नीरस, जोगी कहलाता है!

पर कटा पेड़ तो फल नहीं देता,

सड़कर गलकर मर जाता है!

अत:

सम्यकता ही मार्ग नेक है,

उन्मुक्त जीवन मंज़िल तक,

चप्पु मुस्कानों के खेंचों,

खेवों नाव को साहिल तक!

पा जाओगे जिसकी चाह है,

बिना किये किनारे भी,

देखों क्षितिज पर मिल ही जाते,

धरती और सितारे भी!

#Nkpenning

शब्द सराय में!

मेरा लेखन मेरे शब्दों की जीवनयात्रा हैं,

और तुम्हारा उन्हें पढ़ लेना, उनका मोक्ष!

न जाने अभी कितना और भटकना होगा,

कितनी यात्राएं पूरी करनी होगी!

बड़े लोग कहते है न?

मोक्ष…सरल नहीं है..!

मोक्ष प्राप्त करने के लिए छोड़नी होगी,

मोक्ष की कामना!

पर बिना मंज़िल का पता जाने…

कितना चल पायेंगे मेरे शब्द..और कहाँ तक?

थकने की आशंका लिये,

मेरे शब्द ठहर गये है..इक अनजान सराय में!

शायद रात ढलते ही..ये हौंसला लेंगे..

फिर से चलने का!

#Nkpenning

ख़ैर..यूंही!

नाम लिया और सलीक़ा छोड़ दिया,

स्वाद ज़ुबां पर उसने फीका छोड़ दिया

आते आते हिचकी हलक में रूक गयी,

याद आने का हमने तरीका छोड़ दिया

हँसी, मोहब्बत, अल्हड़पन औ बेबाकी

जो कुछ भी था तुमसे सीखा छोड़ दिया!

तुम बड़े हो सो तुम पर भी लाज़िम है,

लड़ना हमने तो बेवज़ह ही का छोड़ दिया!

दाइम नहीं दहर में यूं भी कुछ “नितिश”

क्यूं सफ़्हों पे नाम लिक्खा छोड़ दिया!

#Nkpenning

एक गज़ल!

तुम्हारे होने की सफाई नहीं देता,

ये लहजा सच्चा सुनाई नहीं देता,

तुम्हें जो इल्म है, तुम ही बेहतर हो,

यही इल्म जहालत से रिहाई नहीं देता!

इतनी भी क्या अना कि आइने में भी,

ख़ुद अपने सामने कोई दिखाई नहीं देता!

इस दौर की ये बड़ी सीधी हक़ीक़त है,

भलाई के बदले कोई भलाई नहीं देता!

कोईआए, रूके या कि जाये अब..

किसी को रिश्ते की कोई दुहाई नहीं देता..!

#Nkpenning

लौट के बुद्धू जब घर आता है!

लौट के बुद्धू जब घर आता है,

तो पाता है,

घर से जाना ठीक था शायद!

माँ हाथ से अब नहीं खिलाती,

“छोटू…लड्डू “ कह नहीं बुलाती,

मुझ को पापा डाँटे तो भी,

आँखों आँसू भर नहीं लाती,

बुद्धू ख़ुद से भी घबराता,

दो-दो चार समझ नहीं पाता,

बचपन अपना ठीक था शायद!

देर से लौटूं नहीं गुस्सा करती,

गाल पे चिमटी भी नहीं धरती,

चोट लगे जो अब कभी मुझको,

प्यार से माँ नहीं फूँ-फूँ करती!

(काश)

बुद्धू बुद्धू ही रह जाता,

अच्छा था कुछ भी कह जाता,

अनपढ़ रहना ठीक था शायद..!

मैं जो चाहूँ तो भी कैसे

माँ संग आँख-मिचौली खेलूँ,

माँ कहती है आँख का तारा,

इसके आगे क्या मैं बोलूं,

माँ के दिल में ही तो रहता,

धड़कन में सब सुनते रहता,

बुद्धू तब निर्भीक था शायद!

जैसी दिखती वैसी कब है?

माँ हँसती है रोती जब है!

बुद्धू ये पर समझ न पाया,

क्यूं न पेड़ को मिलती छाया?

है अचरज क्या खेल कहानी,

दरिया क्यूं नहीं पीता पानी?

बुद्धू सोचा करता ये अक्सर,

हैं ये गर सच्चाई तो फ़िर,

झूठ ही अपना ठीक था शायद!

‪मिट्टी की छटपटाहट महसूस की तुमने?‬

आँधी बहुत तेज़ थी,

लोग कह रहे है कि रेत का तूफान था,

घर में हर जगह मिट्टी हो गयी है,

पर लोग सहमे हुए नहीं है..क्युंकि तूफान

अब थम गया है!

क्या सभी तूफान थम जाते है?

जब मन क्रंदित हो..और वेदना आंदोलन के चरम पर..

और कोई पूछ ले

“कैसे हो? कुछ कहना चाहते हो?”

तब होता है न

अश्रुगंगा ह्रदय से उद्गम हो

धैर्य के सभी बाँधों को तोड़ते हुए..बह चलती है..

पर क्या हो जब कोई पूछने वाला न हो?

तब तूफान दब जाते है…और उभरते है पुन: प्रलयकारी रूप में!!

मिट्टी की छटपटाहट अगर हवा न सुनती..

तो ये तूफान नहीं उठता..नहीं थमता..

पूछ लेने से..तूफां उठते है..थम जाते है..!

रूक जाना नहीं..!

स्थिरता में कठिनाई बहुत है,

बहने में आसानी है

रूकना अच्छी बात नहीं है,

पल भर की नादानी है

बहती नदियां, हवा भी बहती

धरती कहाँ कब रूकती है?

आकाश भी देखों स्थिर कहाँ है?

अग्नि धधकती रहती है

इन तत्वों का घोल परंतु,

रूकने पर आमादा है,

थोड़ा थोड़ा बेवकूफ़ है,

ज़िद्दी थोड़ा ज्यादा है!

रूके जो पानी तो होता कीचड़,

हवा रूके तो साँसे दूभर,

जीवन समझो दलदल होगा,

थमे जो अग्नि-धरती-अंबर!

काल निरंतर चलता रहता,

अंधियारा-उजियारा भी,

राह का कंकड़ बनता बाधा

पथिक करे किनारा भी,

रूक जाओ तो क्या होगा?

इसका भान अगर कर लो,

भा जाएगा सफर तुम्हें ये,

होंठो पे मुस्कान मगर भर लो!

#Nkpenning

हिम्मत करों…तुम बोल दो..!

जब बोलना बहुत मुश्किल लगे,

और चुप रहना नामुमकिन हो,

बस ज़रा हिम्मत करो…तुम बोल दो..!

बोल दो कि बोलने से जख़्मी होगा बस

लहजा तुम्हारा,

बस ये कि तुम्हारी आवाज़ में खराशे उभर आएंगी,

मगर जो तुम चुप रहे…

ये दिल भर जाएगा..आँखे भर आएंगी…

छलनी हो जाएगा सीना…आत्मा तड़प जाएगी..!

बोल दो…बस ज़रा हिम्मत करों…तुम बोल दो…

मौन भले उत्तम है…किंतु कुछ दुष्कर हालातों में,

मोम पिघालना पड़ता है घोर तिमिर कुछ रातों में,

आसमान गिरने लगेगा तो क्या नीचे दब जाओगे??

आप को बचाने को क्या हाथ न सिर पर लाओगे??

कब तक…कब तक आखिर द्वंद करोगे तुम अंतरमन से?

इतना भी तो कठिन नहीं स्वयं को देख पाना दर्पण से…

रक्त की अंतिम बूंद तक रण में हर योद्धा लड़ता है,

कर्म मार्ग से एक पल को नहीं कभी मुड़ता है…

तुम तो मानव राजहंस हो..क्यूं इतना घबराते हो..?

मौन साधना श्रेष्ठ नहीं कर्म..क्यूंकर चुप रह जाते हो..?

समय कठिन है किंतु परीक्षा विपरीत काल ही होती है…

अंधेरोंके डर से भला कभी दिए की रौशनी सोती है..?

हाँ मगर इस अरण्य मार्ग में

संवेदनशीलता मत खोना…

खेमों में सब बँटे हुए है,

तुम उन जैसे मत होना…

मत सुननी कर्कश वाणी को,

ह्रदय वेदना मत लाना…

हो सके तो अपनी बातों से…

इस जग को प्यारे हर्षाना..!

दुनिया है..बदलती जाती है!

चेहरा चेहरा तस्वीर बदलती जाती है…

दुनिया बदस्तूर बदलती जाती है..!

रफ्ता रफ्ता जड़ें जमाता है दिल में,

दर्द की फ़िर तासीर बदलती जाती है..!

ख़्वाब मिलते है गले जब हक़ीक़त से,

ख़्वाबों की फ़िर ताबीर बदलती जाती है..!

कभी इसके कभी उसके ख़्यालों पर कब्जा..

हर रोज़ मेरी जागीर बदलती जाती है..

तेरा ताज कल किसी और के सिर भी हो सकता है,

तक्दीर है! तक्दीर बदलती जाती है..!

#नितिश #Nkpenning

कितनी ही बाते थी जो हवा हो गयी..!

आवाज़ों के पहाड़ों से…

ख़ामोशी की खाई तक उतरते-उतरते…

कितनी ही बाते थी जो हवा हो गयी..!

वो बातें जिन्हे मुकम्मल होना चाहिए था,

उनका अधूरा रह जाना ऐसा था जैसे

समय के घाट पर लोगों की भीड़ में तेरा खो जाना..!

मुसाफ़िर मुसाफ़त में भटक जाए तो

अच्छा नहीं होता!

ये इतनी सब बाते जो मुझे

सिर्फ और सिर्फ तुमसे करनी थी…

किससे करूँ..? क्या करूँ अब इन सब बातों का..

इन बातों के अब कुछ माने भी कहाँ है?

हाँ ये आवाज़ों का पहाड़ वही पहाड़ है जो

हमने अपनी बातों के, झगड़ों के..

कंकड़-पत्थर से बनाया था…

इन बातों में ख़ुद ही को पाने को,

अपने किस्से ज़माने को सुनाने को..

आहिस्ता..आहिस्ता अब नीचे उतर रहा हूँ मैं..

आवाज़ों के इन पहाड़ों से…

ख़ामोशी की खाई तक उतरते-उतरते…

और कितनी ही बाते है जो हवा हो गयी..!